तथ्यों के बारे में एक टिप्पणी। यह लेख 11 अक्टूबर 2026 की सुबह तक उपलब्ध रिपोर्टिंग पर आधारित है। स्थिति अभी भी बदल रही है।
भाग I: हम यहाँ तक कैसे पहुँचे
ये प्रदर्शन अचानक शुरू नहीं हुए। ये एक युवा आंदोलन का दूसरा अध्याय हैं, जो पाँच महीने पहले इंटरनेट पर एक मज़ाक के रूप में शुरू हुआ था। इनका निशाना, यानी मुख्य चुनाव आयुक्त, घटनाओं की एक ख़ास कड़ी के कारण निशाना बने। इस कड़ी की हर घटना ने अगली घटना को जन्म दिया।
1. एक न्यायाधीश ने युवाओं को "कॉकरोच" कहा (15 मई 2026)
15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई चल रही थी कि क्या कुछ वकीलों की क़ानून की डिग्रियाँ असली हैं। इसी दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक मौखिक टिप्पणी की। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने ऐसे कुछ युवाओं की तुलना कॉकरोच से की जिन्हें "न कोई रोज़गार मिलता है, न पेशे में कोई जगह", और कहा कि उनमें से कुछ मीडिया, सोशल मीडिया, आरटीआई और अन्य तरह के कार्यकर्ता बन जाते हैं जो "सब पर हमला करने लगते हैं"। उन्होंने "परजीवी" (parasites) शब्द का भी इस्तेमाल किया।
इस टिप्पणी पर तुरंत हंगामा हुआ। 16 मई को मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उनकी बात को ग़लत तरीक़े से उद्धृत किया गया है और वे सिर्फ़ उन लोगों की बात कर रहे थे जो फ़र्ज़ी डिग्रियों के सहारे पेशों में घुस आए हैं, देश के युवाओं की नहीं। लेकिन तब तक यह शब्द अपनी अलग पहचान बना चुका था। जिस देश में युवा बेरोज़गारी लगातार चिंता का कारण है, वहाँ बहुत से युवा भारतीयों को इस शब्द में वही तिरस्कार सुनाई दिया जो वे पहले से सत्ता में बैठे लोगों से महसूस करते थे।
2. मज़ाक एक आंदोलन बन गया (16 मई 2026)
जिस दिन सफ़ाई दी गई, उसी दिन राजनीतिक संचार रणनीतिकार अभिजीत दिपके ने ऑनलाइन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की शुरुआत की। यह एक व्यंग्य था: अगर व्यवस्था हमें कॉकरोच समझती है, तो ठीक है, हम कॉकरोच हैं, और कॉकरोच को मारना बहुत मुश्किल होता है, यह सब जानते हैं। रिपोर्टों के अनुसार पहले ही हफ़्ते में इंस्टाग्राम पर इसके फ़ॉलोअर्स 1.5 करोड़ से ज़्यादा हो गए। 21 मई को आईटी अधिनियम की धारा 69A के तहत भारत में इसके X अकाउंट पर रोक लगा दी गई। कुछ ही मिनटों में यह एक नए हैंडल से वापस आ गया, और 7 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट ने अकाउंट से रोक हटाने के मामले में दिपके के पक्ष में फ़ैसला दिया।
3. नीट पेपर लीक ने आंदोलन को एक मुद्दा दिया (मई–जुलाई 2026)
किसी मज़ाक को राजनीति बनने के लिए एक शिकायत चाहिए होती है, और वह जल्दी ही मिल गई। लाखों छात्रों द्वारा दी जाने वाली राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी 3 मई 2026 को हुई। पेपर लीक के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने 12 मई को इसे रद्द कर दिया और मामला सीबीआई को सौंप दिया। सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रक्रिया में गड़बड़ियों ने भी ग़ुस्सा बढ़ाया।
CJP और AISA जैसे वामपंथी छात्र संगठन इंस्टाग्राम से निकलकर सड़कों पर आ गए। दिल्ली के निर्धारित विरोध स्थल जंतर-मंतर पर उनका पहला प्रदर्शन 6 जून को हुआ। जलवायु और शिक्षा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। 20 जुलाई को संसद की ओर निकले मार्च पर लाठीचार्ज हुआ और आँसू गैस छोड़ी गई। दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसके 118 कर्मी घायल हुए, जबकि अस्पताल और पुलिस सूत्रों के अनुसार लगभग 60 प्रदर्शनकारी घायल हुए। एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारते हुए कैमरे में क़ैद हुए एक वरिष्ठ अधिकारी को बाद में उसके पद से हटा दिया गया। सरकार के आश्वासनों के बाद वांगचुक ने 26 दिन बाद अपना अनशन ख़त्म किया।
25 जुलाई 2026 को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया। CJP ने आंदोलन का वह चरण ख़त्म कर दिया। इसके बाद संसद ने सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम में संशोधन पारित किया और सरकार ने पेपर लीक मामलों के लिए फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों की घोषणा की। आंदोलन ने इससे यह सबक लिया कि लगातार, शांतिपूर्ण सड़क का दबाव नतीजे ला सकता है। लेकिन कुछ ही दिनों में CJP और AISA ने सरकार पर प्रदर्शनकारियों को सज़ा न देने का वादा तोड़ने का आरोप लगाया।
4. इस बीच, मतदाता सूचियाँ दोबारा लिखी जा रही थीं (जून 2025 से)
दूसरी शिकायत एक साल से भी ज़्यादा समय से पृष्ठभूमि में पनप रही थी। जून 2025 में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने बिहार में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision, SIR) शुरू किया। यह घर-घर जाकर दोबारा जाँचने की प्रक्रिया है कि किसे वोट देने का अधिकार है। 27 अक्टूबर 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने घोषणा की कि इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा।
मतदाता सूचियों की सफ़ाई एक जायज़ और ज़रूरी काम है, क्योंकि लोग मरते हैं, जगह बदलते हैं और कभी-कभी दो बार दर्ज हो जाते हैं। समस्या इसके पैमाने और तरीक़े में थी। सितंबर 2026 तक, जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया चली, वहाँ की मसौदा सूचियों से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके थे। यह संख्या जापान की आबादी से भी ज़्यादा है। चुनाव आयोग का कहना है कि इनमें ज़्यादातर ऐसे लोग हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जो कहीं और चले गए हैं या जिनका पता नहीं चल सका, कि प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, और ग़लती से हटाया गया कोई भी व्यक्ति दोबारा पंजीकरण करा सकता है। ज़्यादातर विपक्षी दलों समेत आलोचकों का तर्क है कि सबूत देने का बोझ नागरिकों पर डाल दिया गया, कि नाम हटाने की सबसे ज़्यादा मार ग़रीबों, प्रवासियों और अल्पसंख्यकों पर पड़ी है, और कि इससे भाजपा द्वारा जीते गए हाल के राज्य चुनावों के नतीजों पर असर पड़ा है। चुनाव आयोग और भाजपा किसी भी तरह की हेराफेरी से इनकार करते हैं।
5. रेफ़री कौन चुनता है? 2023 का नियुक्ति क़ानून
शक एक ही व्यक्ति पर क्यों टिका, यह समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि उनकी नियुक्ति कैसे हुई। मार्च 2023 में, अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद क़ानून नहीं बनाती, चुनाव आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक समिति करेगी। दिसंबर 2023 में संसद ने ऐसा क़ानून पारित किया, लेकिन इसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रख दिया गया। व्यवहार में इससे चुनाव कराने वाले "रेफ़रियों" के चयन में सरकार को 2-के-मुक़ाबले-1 का बहुमत मिल जाता है। यह क़ानून आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों के लिए दीवानी और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा भी देता है।
ज्ञानेश कुमार को इसी क़ानून के तहत मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। चयन समिति में विपक्ष के एकमात्र सदस्य, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, ने इस पर असहमति नोट दिया था। फ़रवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बने।
6. चिंगारी: इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल (23 सितंबर 2026)
23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस ने पत्रकार रितिका चोपड़ा की एक पड़ताल प्रकाशित की। इसमें बताया गया कि बाक़ी दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, ने लगभग दस महीनों में कम से कम 14 लिखित आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं। उनका कहना था कि SIR से जुड़े आदेश उनकी जानकारी के बिना जारी किए जा रहे थे। रिपोर्ट में बताए गए मुद्दों में ये शामिल थे:
- जुलाई में मतदाता पंजीकरण फ़ॉर्म, फ़ॉर्म 6, में बदलाव, जिसमें आवेदक से पूछा गया कि क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम "पिछले SIR" की सूची में था। रिपोर्ट के अनुसार जोशी ने मई में ही चेताया था कि इसके लिए नियमों में औपचारिक संशोधन ज़रूरी है;
- मतदाता डेटाबेस का केंद्रीकरण और ECINet सॉफ़्टवेयर की विश्वसनीयता;
- पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम बहाल किए जाने के ख़िलाफ़ आयोग की ओर से दायर अपीलें, जिनके बारे में रिपोर्ट के अनुसार संधू ने पूछा था कि इन्हें किसने अधिकृत किया;
- गोवा में योग्य मतदाताओं का सूची से छूट जाना।
चुनाव आयोग ने उसी दिन जवाब दिया कि उसके मुख्य फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और आपत्तियों को "सुझाव" बताया। 26 सितंबर को उसने कुछ प्रक्रियात्मक बदलावों की घोषणा की, जिनमें बैठकों का एजेंडा पहले से भेजना, बैठकों का कार्यवृत्त रखना और अपनी आईटी प्रणालियों के लिए एक समीक्षा पैनल बनाना शामिल था। आलोचकों को लगा कि ये बदलाव किए जाना ही इस बात का संकेत है कि रिपोर्ट सही निशाने पर लगी थी।
यही रिपोर्ट मौजूदा प्रदर्शनों का सीधा कारण है। आंदोलन का तर्क "चुनाव शायद निष्पक्ष न हों" से बदलकर "आयोग के अपने सदस्य कह रहे हैं कि उसके प्रमुख अकेले फ़ैसले ले रहे हैं" हो गया।
7. अल्टीमेटम, गांधी जयंती और अदालतें (सितंबर के अंत से 5 अक्टूबर तक)
CJP ने माँग की कि ज्ञानेश कुमार इस्तीफ़ा दें और उन पर आपराधिक कार्यवाही हो, SIR पर रोक लगे, मतदाता सूची को जनवरी 2025 वाली स्थिति में बहाल किया जाए, 2023 का नियुक्ति क़ानून रद्द हो, और चुनाव आयोग में सुधार किए जाएँ। उसने 2 अक्टूबर, गांधी जयंती की समय-सीमा दी। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस्तीफ़े की माँग का समर्थन किया।
कुमार ने इस्तीफ़ा नहीं दिया। 2 अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क और दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुए। मुंबई में अनुमति नहीं दी गई थी, जहाँ पुलिस ने 2013 के बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश और इलाक़े के "साइलेंस ज़ोन" होने का हवाला दिया। प्रदर्शनकारियों ने गांधीवादी तरीक़ा जेल भरो आंदोलन अपनाया: जानबूझकर गिरफ़्तारी देना, ताकि दिखाया जा सके कि सरकार हर किसी को जेल में नहीं डाल सकती। रिपोर्टों के अनुसार दिपके को कुछ समय के लिए मरीन ड्राइव पर रोका गया।
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कुमार को निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। यह मामला, और 2023 के क़ानून की संवैधानिकता को दी गई चुनौती, अभी लंबित है। अदालतों के जल्दी हस्तक्षेप न करने पर CJP ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया।
पूरी कड़ी एक नज़र में
- एक सरसरी न्यायिक टिप्पणी (15 मई) से निराश युवाओं को एक नाम और पहचान मिलती है।
- वह पहचान एक बहुत बड़ी पहुँच वाला ऑनलाइन आंदोलन (16 मई) बन जाती है।
- नीट लीक (मई) उसे एक ठोस शिकायत देता है, और मंत्री का इस्तीफ़ा (25 जुलाई) दिखाता है कि सड़क का दबाव काम कर सकता है।
- SIR (जून 2025 से) लगभग 13 करोड़ नाम हटाता है और मतदाता सूचियों पर व्यापक अविश्वास पैदा करता है।
- 2023 के क़ानून का मतलब है कि रेफ़री को असल में खिलाड़ियों में से ही एक चुनता है।
- इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट (23 सितंबर) बताती है कि रेफ़री के अपने साथियों ने भी आपत्ति की थी, और अब आंदोलन के पास ज़िम्मेदार ठहराने के लिए एक ख़ास व्यक्ति है।
- समय-सीमा बीत जाती है (2 अक्टूबर), सुप्रीम कोर्ट अंतरिम राहत देने से इनकार करता है (5 अक्टूबर), और आंदोलन दिल्ली को सड़कों पर बुलाता है (10 अक्टूबर)।
भाग II: राज्य ने कैसी प्रतिक्रिया दी
प्रदर्शन से पहले: एक शहर की घेराबंदी
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर जुटने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। उसका कहना था कि अनुरोध बहुत देर से किया गया था और CJP ने पिछले प्रदर्शनों में दिए गए वचनों को तोड़ा था। पुलिस ने चेतावनी दी कि प्रतिबंध तोड़ने वाले पर क़ानूनी कार्रवाई होगी। मध्य दिल्ली के आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई। यह पुरानी धारा 144 की जगह आई है और चार से ज़्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाती है। गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) ने 10 से 20 अक्टूबर तक अपना अलग आदेश लागू किया।
तैयारियाँ किसी सामान्य प्रदर्शन से कहीं आगे की थीं:
- अर्धसैनिक बलों की तैनाती: ThePrint के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 8 से 12 अक्टूबर के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लगभग 23,000 जवान (221 कंपनियाँ) तैनात किए, जिनमें से कुछ जम्मू, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से बुलाए गए। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पुलिस और अर्धसैनिक बलों की कुल तैनाती लगभग 22,000 बताई, और कुछ अन्य रिपोर्टों में यह संख्या 25,000 से ज़्यादा बताई गई।
- राज्यों को निर्देश: केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने राज्यों के पुलिस प्रमुखों से CJP समर्थकों के दिल्ली में "अनधिकृत प्रवेश" को रोकने को कहा। शहर की सीमाओं पर बसों की तलाशी ली गई और वाहनों की जाँच हुई।
- मेट्रो बंद: दिल्ली मेट्रो ने "सुरक्षा कारणों" से लगभग 45 स्टेशन बंद किए (Al Jazeera ने यह संख्या 57 बताई)। ये स्टेशन शुक्रवार रात से लगभग 25 घंटे तक बंद रहे।
- ट्रेनें: नई दिल्ली आने वाली कई लंबी दूरी की ट्रेनें रद्द की गईं। थरूर ने दावा किया कि इनकी संख्या 250 थी।
- इंटरनेट: जंतर-मंतर के लगभग 4 किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया।
शुक्रवार, 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ ट्रेनें चलती रहनी चाहिए, और केवल क़ानून-व्यवस्था की समस्या की आशंका के आधार पर यातायात, ट्रेनों और मेट्रो पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती।
प्रदर्शन के दिन: पहले हिरासत, सवाल बाद में
सुबह लगभग 8:30 बजे से पुलिस ने जंतर-मंतर के पास लोगों को हिरासत में लेकर बसों में, जिनमें जेल वैन भी थीं, बैठाना शुरू कर दिया। स्टेडियमों को अस्थायी हिरासत केंद्र बना दिया गया। उस दिन की कुछ सबसे चौंकाने वाली घटनाएँ:
- विमान के अंदर। CJP संस्थापक अभिजीत दिपके और सह-संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया, जब पुलिस मुंबई से आई उनकी एयर इंडिया की उड़ान में चढ़ गई। पहले से रिकॉर्ड किए गए एक वीडियो में दिपके ने कहा कि वे गिरफ़्तार होने ही आए हैं।
- घर पर। CJP ने कहा कि यूट्यूबर ध्रुव राठी को गुरुग्राम में उनके घर से हिरासत में लिया गया, और पुलिस ने कहा कि उन्हें दिल्ली के बाहर हिरासत में लिया गया। CJP की लीगल हेड रत्ना सिंह ने कहा कि उन्हें जंगपुरा में उनके घर के बाहर रोककर रखा गया। बाद में साकेत की एक अदालत ने पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की उनकी याचिका ख़ारिज कर दी।
- वकील। सुप्रीम कोर्ट से जंतर-मंतर की ओर मार्च कर रहे वकीलों को हिरासत में लिया गया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप करने को कहा और वकीलों, ख़ासकर महिलाओं, के ख़िलाफ़ बल प्रयोग की निंदा की। ThePrint के अनुसार मुख्य न्यायाधीश और सॉलिसिटर जनरल ने वकीलों की रिहाई के लिए अधिकारियों से बात की।
- पत्रकार। Scroll ने कहा कि उसके रिपोर्टर आयुष तिवारी को आईटीओ के पास एचकेएस भवन के बाहर अपना प्रेस कार्ड दिखाने के बाद हिरासत में लिया गया। Newslaundry ने कहा कि उसके तीन पत्रकारों को हिरासत में लिया गया और उसके आधिकारिक फ़ोन ज़ब्त कर लिए गए। The Wire की तीन रिपोर्टरों ने कहा कि प्रेस पहचान-पत्र दिखाने के बावजूद उन्हें गोल मार्केट के पास लगभग हिरासत में ले ही लिया गया था। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने उनकी रिहाई की माँग की।
- नेता। Al Jazeera और ThePrint के अनुसार हिरासत में लिए गए लोगों में अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और तृणमूल सांसद, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, सीपीआई(एम) सांसद जॉन ब्रिटास, सीपीआई(एमएल) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, योगेंद्र यादव, वकील प्रशांत भूषण और AISA अध्यक्ष नेहा बोरा शामिल थे। आम आदमी पार्टी ने कहा कि पुलिस ने उसका राष्ट्रीय कार्यालय सील कर दिया।
- दिल्ली के बाहर। रिपोर्टों के अनुसार मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में 400 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया, और तुषार गांधी को मुंबई के एक पुलिस थाने में रखा गया। पत्रकार मनदीप पुनिया के अनुसार हरियाणा के एक गाँव में ग्रामीणों ने उल्टा उन पुलिसकर्मियों को ही रोक लिया जो एक प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेने आए थे।
प्रदर्शनकारियों की ओर से भी सब कुछ पूरी तरह अहिंसक नहीं रहा। PTI के अनुसार आकाशवाणी भवन के पास पथराव में दो पुलिसकर्मी घायल हुए। इसकी निंदा होनी चाहिए, और पुलिस को इसके ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करने का अधिकार था। लेकिन इससे उन हिरासतों का कारण नहीं समझाया जा सकता जो इससे घंटों पहले हवाई अड्डों और लोगों के घरों से शुरू हो चुकी थीं।
कितने लोग हिरासत में लिए गए?
इस पर कोई सहमति नहीं है, और यह अपने आप में इस कहानी का हिस्सा है: जब सरकार औपचारिक गिरफ़्तारी के बिना बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लेती है, तो गिनती के लिए कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं होता।
| स्रोत | आँकड़ा |
|---|---|
| Reuters द्वारा उद्धृत पुलिस सूत्र | केंद्रीय व्यावसायिक क्षेत्र में लगभग 200 |
| दिल्ली पुलिस का बयान (सुबह), ThePrint के माध्यम से | शहर में आ रहे लगभग 500 लोग, और "आपराधिक पृष्ठभूमि" वाले लगभग 50 लोग |
| Al Jazeera | 1,000 से ज़्यादा |
| पुलिस सूत्र, Pragativadi के माध्यम से (केवल एक स्रोत) | शनिवार रात तक 4,000 से ज़्यादा रिहा किए गए |
| कॉकरोच जनता पार्टी (दावा) | देश भर में कम से कम 10,000, जिनमें दिल्ली आते समय रास्ते में रोके गए लोग भी शामिल हैं |
रात होने के बाद
शनिवार रात लगभग 8 बजे से पुलिस ने कई केंद्रों से हिरासत में लिए गए लोगों को छोड़ना शुरू किया। रिपोर्टों के अनुसार दिपके, दास और रांका अब भी हिरासत में थे और उन्हें अलग-अलग जगहों पर रखा गया था। शनिवार देर शाम दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसने दिपके को उनकी दादी के निधन की सूचना दी है और मानवीय आधार पर उनकी यात्रा में मदद की पेशकश की है। CJP के कार्यवाहक नेता अजिंक्य शिंदे ने कहा कि तीनों को वकीलों से मिलने नहीं दिया गया, कि आंदोलन रविवार को फिर से जंतर-मंतर पहुँचने की कोशिश करेगा, और "जब तक ज्ञानेश कुमार इस्तीफ़ा नहीं देते" यह नहीं रुकेगा। विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन ने सोमवार, 12 अक्टूबर को दिल्ली में मार्च का आह्वान किया। वांगचुक ने हालात को "अघोषित आपातकाल" कहा और कहा कि अगर हिरासत में लिए गए लोग रिहा नहीं हुए तो वे अनशन या पदयात्रा पर विचार करेंगे।
भाग III: वह भीड़ जिसे रोका नहीं गया: बजरंग दल और भीड़ की हिंसा
अगर 10 अक्टूबर की कोई एक तस्वीर पूरी समस्या को बयान करती है, तो वह पुलिस की तस्वीर नहीं है।
चेतावनी, और इनकार
8 अक्टूबर को CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने X पर लिखा कि "भाजपा में ऊँचे पद पर बैठे किसी व्यक्ति" ने उन्हें बताया है कि प्रदर्शन पर हमला करने के लिए देश भर से दक्षिणपंथी अतिवादी समूहों को जुटाया जा रहा है। उन्होंने वादा किया कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहेगा ("हम हाथ नहीं उठाएँगे") और गृह मंत्री अमित शाह से इस पर ध्यान देने को कहा। उसी दिन विश्व हिंदू परिषद की युवा शाखा बजरंग दल ने X पर कहा कि उसके कार्यकर्ताओं के जंतर-मंतर पहुँचने की "ऐसी कोई योजना नहीं" है। उसने इस आरोप को "भ्रामक प्रचार" कहा, कहा कि वह "अराजक" प्रदर्शनों का विरोध करता है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त को निशाना बनाने वाले प्रदर्शन भी शामिल हैं, और भविष्यवाणी की कि यह आंदोलन "अपनी स्वाभाविक मौत मर जाएगा"।
The Quint के अनुसार दक्षिणपंथी सोशल मीडिया हस्तियों पिंकी चौधरी और स्वतंत्र भारद्वाज ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे CJP प्रदर्शनकारियों पर हमला करेंगे। यानी ख़तरा सार्वजनिक था, स्पष्ट था और पुलिस को पहले से इसकी जानकारी थी।
कनॉट प्लेस, शनिवार दोपहर
10 अक्टूबर को The Quint द्वारा कनॉट प्लेस में शूट किया गया एक वीडियो, जो बाद में बड़े पैमाने पर फैल गया, में कुछ लोगों का एक समूह एक प्रदर्शनकारी को पीटता हुआ दिख रहा है। एक दूसरी क्लिप में दो लोग एक युवा महिला प्रदर्शनकारी पर हमला करते दिख रहे हैं। भीड़ ऐसे नारे लगा रही थी जिनमें पुलिस से प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ चलाने को कहा जा रहा था ("दिल्ली पुलिस तुम लठ बजाओ"), और एक व्यक्ति ध्रुव राठी को खुलेआम धमकी देते हुए कैमरे में क़ैद हुआ।
The Quint ने वहाँ मौजूद एक व्यक्ति, रितेश ठाकुर, से बात की, जिन्होंने ख़ुद को बजरंग दल और हिंदू राष्ट्र परिषद का सदस्य बताया। उन्होंने कहा, "इन कॉकरोचों की हर जगह पिटाई हो रही है।" हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कहा कि उन्हें प्रदर्शन की मुख्य माँग, यानी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े, से कोई आपत्ति नहीं है। उनकी शिकायत यह थी कि CJP ने भगवान राम और सीता का अपमान किया है। The Quint को CJP से जुड़े किसी भी व्यक्ति द्वारा ऐसा कोई बयान दिए जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रदर्शनकारियों ने "भारत के टुकड़े होंगे" के नारे लगाए, लेकिन बोलने वाले की पहचान वे केवल "नीले स्कार्फ़ वाला कोई व्यक्ति" के रूप में ही कर सके।
अन्य रिपोर्टों में पत्रकारों पर भी हमलों की बात कही गई, और एक वीडियो में एक व्यक्ति के हाथ में ब्रास नकल्स दिख रहे हैं। एक विवरण के अनुसार पुलिस ने इन लोगों को खदेड़ा और लगभग आधे घंटे बाद पालिका बाज़ार के पास उनमें से कुछ को हिरासत में लिया। एक मीडिया छात्र ने पत्रकारों को बताया कि पास खड़ी पुलिस ने "उन्हें रोका तक नहीं"।
क्या साबित है, और क्या नहीं
- वीडियो से साबित: 10 अक्टूबर को मध्य दिल्ली में, निषेधाज्ञा और भारी पुलिस तैनाती वाले इलाक़े में, एक भीड़ ने महिलाओं समेत प्रदर्शनकारियों पर हमला किया।
- उसके अपने बयान से साबित: उस भीड़ में कम से कम एक व्यक्ति कहता है कि वह बजरंग दल से जुड़ा है।
- साबित नहीं: कि बजरंग दल ने एक संगठन के रूप में इस हमले की योजना बनाई या इसका निर्देश दिया। उसने जंतर-मंतर पर कार्यकर्ता जुटाने की किसी भी योजना से इनकार किया था। इस लेख के लिखे जाने तक मुझे कनॉट प्लेस की घटना पर उसका कोई सार्वजनिक बयान नहीं मिला।
- जहाँ तक मुझे मिला, कोई रिपोर्ट नहीं: हमलावरों के ख़िलाफ़ किसी एफ़आईआर की। जबकि जुलाई के चरण के प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर रिकॉर्ड में दर्ज हैं।
एक पैटर्न, कोई अपवाद नहीं
इस साल यह पहली बार नहीं था जब दिल्ली में बजरंग दल की गतिविधियाँ हिंसक हुईं। 30 जून 2026 को दिल्ली के सागरपुर में बजरंग दल और भाजपा कार्यकर्ताओं ने मुहर्रम के जुलूस में दिखे एक झंडे को लेकर, जिसे वे पाकिस्तानी बता रहे थे, "विरोध" के रूप में हनुमान चालीसा का पाठ किया। दिल्ली पुलिस ने ख़ुद कहा कि कोई पाकिस्तानी झंडा नहीं दिखाया गया था और वे धार्मिक झंडे थे। इसके बाद जो हुआ, उसके विवरण अलग-अलग हैं। बजरंग दल के सदस्यों ने कहा कि उन पर पत्थर फेंके गए। मुस्लिम निवासियों ने कहा कि महिलाओं और बच्चों पर हमला हुआ। Newslaundry ने एक वीडियो की रिपोर्ट की जिसमें एक कार्यकर्ता हाथ में हँसिया लेकर भीड़ को संबोधित करते हुए मुसलमानों को जान से मारने की धमकी दे रहा था। अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया।
दोनों घटनाओं को साथ रखें तो वह दिखता है जिसे विद्वान चयनात्मक क़ानून-प्रवर्तन (selective enforcement) कहते हैं। धारा 163 का इस्तेमाल शांतिपूर्ण नागरिकों को इकट्ठा होने से भी रोकने के लिए होता है, जबकि सत्ताधारी दल से जुड़े समूह इकट्ठा हो सकते हैं, धमका सकते हैं और लोगों को पीट सकते हैं, और इसके नतीजे बहुत कम दिखते हैं। तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भीड़ की हिंसा को होने से पहले रोकना सरकार का कर्तव्य है, जिसमें संभावित भीड़ हिंसा की ख़ुफ़िया जानकारी और उसे भड़काने वाले उकसावे भरे संदेशों पर कार्रवाई करना शामिल है। पहले से घोषित एक धमकी, जिसे उस दिन देश के सबसे भारी पुलिस तैनाती वाले इलाक़ों में से एक में अंजाम दिया गया, ठीक वैसा ही मामला है जिसके लिए यह कर्तव्य बनाया गया है।
भाग IV: सरकार का पक्ष, गंभीरता से
निष्पक्ष होने का मतलब है दूसरे पक्ष को उसके सबसे मज़बूत रूप में रखना।
- चुनावों पर: चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए और किसी संस्था के भीतर असहमति सामान्य बात है। उसके अनुसार हटाए गए नाम मृत, स्थानांतरित और दोहरे मतदाताओं के हैं, और ग़लती से हटाया गया कोई भी व्यक्ति दोबारा पंजीकरण करा सकता है। भाजपा का कहना है कि उसकी जीत प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और आर्थिक विकास के कारण है, और विपक्ष अपनी हार का दोष रेफ़री पर डाल रहा है।
- प्रदर्शन पर: पुलिस का कहना है कि अनुमति बहुत देर से माँगी गई और पिछले प्रदर्शनों में दिए गए वचन तोड़े गए। वह 20 जुलाई के मार्च का हवाला देती है, जिसके बाद उसने 118 कर्मियों के घायल होने की बात कही थी, और 10 अक्टूबर के पथराव का भी। उसने प्रतिबंधों को "अस्थायी और एहतियाती" बताया, जिनका मक़सद प्रदर्शनकारियों और निवासियों दोनों की सुरक्षा था।
- आंदोलन पर: भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रदर्शनकारियों को "अराजक तत्व" और उस दिन को "फ़्लॉप शो" कहा। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने CJP और राहुल गांधी पर देश को अस्थिर करने की कोशिश का आरोप लगाया और कहा कि "भारतीय लोकतंत्र में अपार शक्ति है"।
इनमें से कुछ बातों में दम है। मतदाता सूचियों की सफ़ाई सचमुच ज़रूरी है। बड़ी भीड़ को संभालना पुलिस का कर्तव्य है, और अधिकारियों के ख़िलाफ़ हिंसा ग़लत है। लेकिन इनमें से हर बात एक सीमित, लक्षित प्रतिक्रिया को ही सही ठहराती है, जैसे भीड़ का प्रबंधन करना, पथराव करने वालों को गिरफ़्तार करना या अदालत में आरोपों का जवाब देना। इनमें से कोई भी बात राजधानी को बंद करने, लोगों को कुछ करने से पहले ही विमानों और घरों से हिरासत में लेने, पत्रकारों और वकीलों को पकड़ने, और भीड़ को खुला छोड़ देने को सही नहीं ठहराती। आनुपातिकता (proportionality) ही कसौटी है, और यह प्रतिक्रिया उस पर खरी नहीं उतरी। अगर, जैसा भाजपा कहती है, यह प्रदर्शन बिना जन-समर्थन वाला "फ़्लॉप शो" था, तो इतने असाधारण सुरक्षा अभियान का औचित्य और भी कमज़ोर हो जाता है।
भाग V: राजनीति विज्ञान हमें क्या बताता है
किसी शहर को सिर्फ़ इसलिए बंद कर दिया जाए कि लोग एक सभा न कर सकें, तो कुछ ग़लत होने का एहसास करने के लिए किसी डिग्री की ज़रूरत नहीं है। राजनीति विज्ञान इस एहसास को सटीक बनाने में मदद कर सकता है। यहाँ वे विचार हैं जो मुझे सबसे उपयोगी लगते हैं, सरल भाषा में।
1. लोकतंत्र सिर्फ़ मतदान नहीं है
राजनीति विज्ञानी रॉबर्ट डाल ने एक कार्यशील लोकतंत्र को, जिसे उन्होंने पॉलीआर्की (polyarchy) कहा, चुनावों से ज़्यादा की ज़रूरत वाला बताया। इसके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना के वैकल्पिक स्रोतों तक पहुँच, और संगठन बनाने की स्वतंत्रता भी ज़रूरी है। ये कोई ऐच्छिक चीज़ें नहीं हैं। इन्हीं के ज़रिए नागरिक जान पाते हैं कि सरकार क्या कर रही है और उसे बदलने के लिए संगठित हो पाते हैं। 10 अक्टूबर को तीनों पर एक साथ रोक लगी: लोग इकट्ठा नहीं हो सकते थे, इंटरनेट बंद था, और पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। ऐसी परिस्थितियों में हुआ चुनाव भी चुनाव ही है, लेकिन उसके आसपास का लोकतंत्र कमज़ोर हो जाता है।
2. रेफ़रियों की निगरानी कौन करे?
How Democracies Die (2018) में स्टीवन लेवित्स्की और डैनियल ज़िब्लाट तर्क देते हैं कि आधुनिक लोकतंत्र शायद ही कभी तख़्तापलट से ख़त्म होते हैं। अक्सर वे क़ानूनी तरीक़ों से धीरे-धीरे कमज़ोर होते हैं, और इसका एक पहला क़दम होता है रेफ़रियों पर क़ब्ज़ा: अदालतें, चुनाव अधिकारी और जाँच एजेंसियाँ। एक ऐसा रेफ़री जिसे एक टीम चुनती है, और जिसके अपने साथी रिपोर्टों के अनुसार यह आपत्ति करते हैं कि वह अकेले फ़ैसले ले रहा है, भरोसे को नुक़सान पहुँचाता है, भले ही उसका हर फ़ैसला सही निकले। राजनीति विज्ञानी गिलेर्मो ओ'डॉनेल ने इसे क्षैतिज जवाबदेही (horizontal accountability) कहा, यानी संस्थाओं का एक-दूसरे पर अंकुश रखना। 2023 के क़ानून ने चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर इसे कमज़ोर किया। CJP की माँगें मूल रूप से इसी को बहाल करने की माँगें हैं।
3. कार्यपालिका का सत्ता-विस्तार
नैंसी बर्मियो (2016) ने देखा कि आज लोकतंत्र में गिरावट आमतौर पर "कार्यपालिका के सत्ता-विस्तार" (executive aggrandizement) के ज़रिए होती है: चुनी हुई सरकारें अपनी शक्ति पर लगे अंकुशों को एक-एक क़दम करके कमज़ोर करती हैं, और हर क़दम अपने आप में क़ानूनी होता है। कोई भी एक क़दम तख़्तापलट जैसा नहीं दिखता, लेकिन सब मिलकर शक्ति का संतुलन बदल देते हैं। इसी आधार पर भारत की लोकतांत्रिक रेटिंग पहले ही घटाई जा चुकी है। 2021 से V-Dem भारत को "चुनावी निरंकुशता" (electoral autocracy) की श्रेणी में रखता है और फ़्रीडम हाउस इसे "आंशिक रूप से स्वतंत्र" (Partly Free) मानता है। सरकार इन दोनों आकलनों को ख़ारिज करती है, लेकिन 10 अक्टूबर की घटनाएँ ठीक उसी तरह के सबूत हैं जिन्हें ऐसे सूचकांक दर्ज करते हैं।
4. भारत के संविधान में विरोध का अधिकार
अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) बोलने की स्वतंत्रता और "शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होने" के अधिकार की गारंटी देते हैं। अनुच्छेद 19(3) संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में केवल युक्तियुक्त (reasonable) प्रतिबंधों की अनुमति देता है। भारतीय अदालतों ने स्पष्ट किया है कि "युक्तियुक्त" का क्या अर्थ है:
- रामलीला मैदान घटना (2012): सुप्रीम कोर्ट ने बाबा रामदेव के सोते हुए समर्थकों पर आधी रात की पुलिस कार्रवाई को शक्ति का दुरुपयोग माना, और कहा कि सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था और विरोध के अधिकार के बीच संतुलन बनाना होगा।
- मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018): अदालत ने जंतर-मंतर और बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध की अनुमति नहीं दी, और कहा कि विरोध के अधिकार को नियमन के साथ जगह दी जानी चाहिए, उसे मिटाया नहीं जा सकता।
- अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020): अदालत ने कहा कि इंटरनेट बंदी ज़रूरी, आनुपातिक, अस्थायी और प्रकाशित होनी चाहिए, और धारा 144 जैसे आदेशों का इस्तेमाल विचारों की वैध अभिव्यक्ति को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।
- अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020, शाहीन बाग़ मामला): अदालत ने कहा कि प्रदर्शनकारी सार्वजनिक सड़कों पर अनिश्चितकाल तक क़ब्ज़ा नहीं कर सकते। यह फ़ैसला प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ जाता है, लेकिन ध्यान दें कि यह किस बात से जुड़ा है। यह सार्वजनिक जगह पर अनिश्चितकालीन क़ब्ज़े के बारे में है, न कि विरोध के लिए निर्धारित स्थल पर एक दिन की सभा के बारे में।
इन मानकों के सामने, निर्धारित स्थल पर एक दिन के प्रदर्शन को रोकने के लिए पहले से की गई सामूहिक हिरासत, पूरे शहर का परिवहन बंद करना और इंटरनेट ब्लैकआउट को आनुपातिक ठहराना बहुत मुश्किल है।
5. प्रक्रिया ही सज़ा है
विधि-विद्वान मैल्कम फ़ीली ने निचली अदालतों पर एक प्रसिद्ध अध्ययन लिखा, जिसका नाम है The Process Is the Punishment (प्रक्रिया ही सज़ा है)। उनका कहना था कि बहुत से लोगों के लिए व्यवस्था की परेशानी, जैसे हिरासत, स्टेडियम तक बस की यात्रा, बर्बाद हुआ दिन और ज़ब्त किया गया फ़ोन, ही असली सज़ा होती है, चाहे उन पर कभी आरोप लगे या नहीं। बड़े पैमाने पर "निवारक" हिरासत इसी तरह काम करती है। ज़्यादातर लोग रात तक बिना किसी आरोप के छोड़ दिए जाते हैं, इसलिए अदालत के पास समीक्षा के लिए कुछ नहीं होता। लेकिन जिसे भी पकड़ा गया, और जिसने भी यह होते देखा, वह सीख जाता है कि प्रदर्शन में शामिल होने की एक क़ीमत है। वकील इसे "चिलिंग इफ़ेक्ट" (भयकारी प्रभाव) कहते हैं। यह विरोध को बलपूर्वक नहीं रोकता। यह लोगों को डराकर रोकता है।
6. हिंसा पर राज्य का एकाधिकार, और उसकी आउटसोर्सिंग
मैक्स वेबर ने राज्य की प्रसिद्ध परिभाषा दी थी: वह संस्था जो बल के वैध उपयोग पर एकाधिकार का दावा करती है। जब राज्य शांतिपूर्ण नागरिकों को इकट्ठा होने से रोकता है और साथ ही अपने अनुकूल भीड़ को उन पर हमला करने देता है, तो वह असल में हिंसा की आउटसोर्सिंग कर रहा होता है। भीड़-न्याय (vigilantism) पर काम करने वाले विद्वान इसे ऐसी हिंसा के रूप में बताते हैं जिसे राज्य औपचारिक आदेश दिए बिना बर्दाश्त करता है। यह दोनों तरफ़ से सबसे बुरी स्थिति है: नागरिकों पर हमला होता है, और आधिकारिक तौर पर कोई ज़िम्मेदार नहीं होता। इसीलिए कनॉट प्लेस का वीडियो हिरासत के किसी भी एक आँकड़े से ज़्यादा मायने रखता है।
7. निकास, आवाज़ और निष्ठा
अर्थशास्त्री अल्बर्ट हर्शमैन ने तर्क दिया कि किसी संस्था से नाख़ुश लोगों के पास तीन विकल्प होते हैं: निकास (exit, छोड़ देना), आवाज़ (voice, शिकायत करना और बदलाव के लिए दबाव डालना) या निष्ठा (loyalty, बने रहना और सहते रहना)। एक स्वस्थ व्यवस्था आवाज़ को सुनती है, क्योंकि आवाज़ से ही उसे अपनी कमियों का पता चलता है। लीक हुई परीक्षाओं, कम नौकरियों और अपने वोट पर संदेह का सामना कर रहे युवा भारतीयों के लिए निकास का मतलब अक्सर विदेश जाना होता है, और निष्ठा का मतलब हार मान लेना। CJP आवाज़ है। जो राज्य आवाज़ का जवाब हिरासत से देता है, वह केवल बाक़ी दो विकल्प छोड़ता है, और दोनों में से कोई भी देश के लिए अच्छा नहीं है।
8. एक ईमानदार पेच: आंबेडकर का "अराजकता का व्याकरण"
निष्पक्ष रहें तो भारत में सड़क की राजनीति के ख़िलाफ़ सबसे प्रसिद्ध चेतावनी संविधान के मुख्य निर्माता की ही है। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में बी.आर. आंबेडकर ने तर्क दिया कि जब संवैधानिक तरीक़े उपलब्ध हों, तो असंवैधानिक तरीक़े, जिनमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह शामिल हैं, "अराजकता का व्याकरण" (grammar of anarchy) हैं और इन्हें छोड़ देना चाहिए। कार्रवाई के समर्थक पहले भी यह तर्क इस्तेमाल कर चुके हैं।
आंबेडकर का तर्क यह मानकर चलता है कि संवैधानिक रास्ते वास्तव में खुले हैं। शांतिपूर्ण सभा ख़ुद एक संवैधानिक तरीक़ा है, जिसकी गारंटी अनुच्छेद 19(1)(b) देता है। प्रदर्शनकारियों ने उसी जगह पर इकट्ठा होने की माँग की थी जिसे सरकार ने ख़ुद विरोध के लिए निर्धारित किया है, और वे एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था से जवाबदेही माँग रहे थे। जब उस संस्था की स्वतंत्रता पर ही संदेह हो और निर्धारित स्थल पर सभा पर पहले से रोक लगा दी जाए, तो संवैधानिक तरीक़ों से हटने वाले प्रदर्शनकारी नहीं हैं। उसी भाषण में आंबेडकर ने यह भी चेताया था कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता, और राजनीति में व्यक्ति-पूजा के ख़िलाफ़ भी चेतावनी दी थी। दोनों चेतावनियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।
भाग VI: यह लोकतंत्र की भावना के ख़िलाफ़ क्यों है
सब कुछ एक साथ रखें तो समस्या यह नहीं है कि सरकार प्रदर्शनकारियों से असहमत थी। सरकारों को असहमत होने का अधिकार है, और मतदाता इसके लिए उनका मूल्यांकन कर सकते हैं। समस्या यह है कि उसने कैसे प्रतिक्रिया दी:
- उसने सभा को ही ख़तरा मान लिया। लोगों को इस आधार पर हिरासत में लिया गया कि वे कहाँ जा रहे थे और वे कौन थे, न कि उन्होंने क्या किया था।
- उसने सूचना का प्रवाह रोक दिया, इंटरनेट ब्लैकआउट और पत्रकारों की हिरासत के ज़रिए, ठीक उस समय जब नागरिकों को सबसे ज़्यादा जानने की ज़रूरत थी कि क्या हो रहा है।
- उसने संदेशवाहकों को सज़ा दी और भीड़ को छोड़ दिया, जिससे क़ानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) और लोगों की रक्षा करने का राज्य का कर्तव्य दोनों कमज़ोर हुए।
- उसने असली सवाल का जवाब नहीं दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले फ़ैसले लिए या नहीं, और 13 करोड़ नाम हटाना सही था या नहीं, ये तथ्य के सवाल हैं। इनका जवाब दस्तावेज़ों, ऑडिट और अदालती सुनवाइयों से दिया जाना चाहिए, बैरिकेड से नहीं।
- उसने वही अविश्वास और गहरा किया जिससे वह डरने का दावा करती है। लोगों को यह पूछने से रोकने के लिए बंद किया गया हर मेट्रो स्टेशन कि क्या चुनाव निष्पक्ष हैं, और ज़्यादा लोगों को यही सवाल पूछने पर मजबूर करता है।
इस बात की परवाह करने के लिए आपको CJP से सहमत होने, उसकी राजनीति से इत्तेफ़ाक रखने या उसके मज़ाक को मज़ेदार मानने की ज़रूरत नहीं है। इस हफ़्ते जिन नियमों की परीक्षा हो रही है, जैसे क्या कोई सरकार एक क़ानूनी प्रदर्शन को रोकने के लिए पूरे शहर को बंद कर सकती है, और क्या कोई भीड़ पुलिस की आँखों के सामने लोगों को पीट सकती है, वे हर भावी सरकार और हर भावी प्रदर्शनकारी पर लागू होंगे, उन पर भी जिनसे आप सहमत हैं। लोकतांत्रिक अधिकारों का मतलब तभी है जब उन लोगों के लिए भी उनकी रक्षा हो जिनसे आप असहमत हैं।
आगे किन बातों पर नज़र रखें
- अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका रिहा होते हैं या उन पर औपचारिक आरोप लगाए जाते हैं, और किन धाराओं के तहत।
- रविवार, 11 अक्टूबर को CJP की जंतर-मंतर लौटने की कोशिश, और सोमवार, 12 अक्टूबर के लिए घोषित INDIA गठबंधन का मार्च।
- कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखे लोगों के ख़िलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज होती है या नहीं।
- मुख्य चुनाव आयुक्त और 2023 के नियुक्ति क़ानून के ख़िलाफ़ याचिकाओं पर, और हिरासत तथा बंदी से जुड़ी किसी भी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का रुख़।
- 2027 की शुरुआत से उत्तर प्रदेश समेत बड़े राज्यों के चुनाव, जो सभी SIR के तहत संशोधित सूचियों पर होंगे।
समय-रेखा एक नज़र में
- जून 2025बिहार में मतदाता सूचियों का SIR शुरू।
- 27 अक्टू. 2025मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने देशव्यापी SIR की घोषणा की।
- 3 और 12 मई 2026नीट-यूजी हुई, फिर पेपर लीक के बाद रद्द।
- 15 मई 2026अदालत में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की "कॉकरोच" टिप्पणी; 16 मई को सफ़ाई।
- 16 मई 2026अभिजीत दिपके ने कॉकरोच जनता पार्टी शुरू की।
- 6 जून 2026जंतर-मंतर पर CJP का पहला प्रदर्शन।
- 28 जून 2026सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल शुरू की।
- 30 जून 2026सागरपुर में बजरंग दल का "विरोध" हिंसक हुआ।
- 20 जुलाई 2026संसद मार्च पर लाठीचार्ज और आँसू गैस।
- 25 जुलाई 2026शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा।
- 23 सित. 2026इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट: दो चुनाव आयुक्तों की 14 से ज़्यादा आपत्तियाँ।
- 2 अक्टू. 2026इस्तीफ़े की समय-सीमा ख़त्म; मुंबई और दिल्ली में प्रदर्शन; जेल भरो।
- 5 अक्टू. 2026सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने से इनकार किया, नोटिस जारी किया।
- 8 अक्टू. 2026CJP ने दक्षिणपंथी लामबंदी की चेतावनी दी; बजरंग दल ने किसी योजना से इनकार किया।
- 9 अक्टू. 2026अनुमति से इनकार; मेट्रो, ट्रेनों और इंटरनेट पर रोक; अर्धसैनिक बल तैनात।
- 10 अक्टू. 2026पूरी दिल्ली में सामूहिक हिरासत; CJP नेता विमान से हिरासत में; कनॉट प्लेस में भीड़ ने प्रदर्शनकारियों पर हमला किया।
स्रोत
- Al Jazeera: India's 'Cockroach' leaders detained; New Delhi in lockdown (10 अक्टूबर 2026)
- Al Jazeera: India deploys police and restricts transport ahead of mass protest in Delhi (10 अक्टूबर 2026)
- Reuters, The Spokesman-Review के माध्यम से: India detains protesters, locks down Delhi ahead of rally against election chief
- NPR: India cracks down on youth protests as anger grows against Modi and election chief (10 अक्टूबर 2026)
- ThePrint: Jantar Mantar 2.0 live updates (9–10 अक्टूबर 2026)
- The Kathmandu Post: Mass detentions, journalist arrests as Delhi police move to block protest (10 अक्टूबर 2026)
- The Quint: Hindu right-wing mob runs wild under Delhi Police's watch despite Section 163 (10 अक्टूबर 2026)
- ThePrint: No plan to mobilise volunteers at Jantar Mantar on October 10, says Bajrang Dal (8 अक्टूबर 2026)
- The Tribune: CJP claims right-wing fringe groups being mobilised to create violence (9 अक्टूबर 2026)
- NewsBytes: Right-wing groups attack protesters, journalists in Delhi despite 25,000-plus personnel
- Pragativadi: Delhi Police release detainees; Dipke and core team remain in custody (10 अक्टूबर 2026)
- Newslaundry: 'Pakistani' flag claim, contested DDA park: Anatomy of the Sagarpur communal violence (6 जुलाई 2026)
- The Week: CJI Surya Kant clarifies 'cockroaches' remark (16 मई 2026)
- The Wire: Outrage over CJI Surya Kant's 'cockroaches, parasites' remarks
- India.com: CJP announces Jail Bharo Andolan in Mumbai on Gandhi Jayanti
- Free Press Journal: CJP protest at Shivaji Park, live updates (2 अक्टूबर 2026)
- Al Jazeera: India's 'cockroach' movement demands election chief's resignation (25 सितंबर 2026)
- Wikipedia: 2026 Indian electoral controversy (इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट, चुनाव आयोग के जवाब और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सारांश)
- Wikipedia: 2026 Delhi Jantar Mantar protests और Cockroach Janta Party (जून–जुलाई के घटनाक्रम के लिए, उद्धृत समाचार रिपोर्टों से मिलान करके)
- Robert A. Dahl, Polyarchy: Participation and Opposition (1971); Guillermo O'Donnell, "Horizontal Accountability in New Democracies" (1998); Nancy Bermeo, "On Democratic Backsliding," Journal of Democracy (2016); Steven Levitsky & Daniel Ziblatt, How Democracies Die (2018); Malcolm Feeley, The Process Is the Punishment (1979); Albert O. Hirschman, Exit, Voice, and Loyalty (1970); Max Weber, "Politics as a Vocation" (1919)।
- भारत का सुप्रीम कोर्ट: In re Ramlila Maidan Incident (2012); Anoop Baranwal v. Union of India (2023); Mazdoor Kisan Shakti Sangathan v. Union of India (2018); Tehseen S. Poonawalla v. Union of India (2018); Anuradha Bhasin v. Union of India (2020); Amit Sahni v. Commissioner of Police (2020)। बी.आर. आंबेडकर, संविधान सभा की बहस, 25 नवंबर 1949।
यह लेख कैसे लिखा गया। इस लेख के लिए शोध और इसका मसौदा एक AI सहायक (Anthropic का Claude) की मदद से तैयार किया गया है, और इसका हिंदी अनुवाद भी उसी ने किया है। तथ्य ऊपर दिए गए स्रोतों से लिए गए हैं, लेकिन AI की मदद से लिखे गए लेख में ग़लतियाँ हो सकती हैं। अगर आपको कोई ग़लती दिखे, तो कृपया मुझे बताएँ।